जन्माष्टमी पर निबन्ध  ( Essay on Janamashtmi  in Hindi ) 

जन्माष्टमी पर निबन्ध ( Essay on Janamashtmi in Hindi ) 

त्यौहार किसी भी राष्ट्र एवं जाति की सामूहिक चेतना को उजागर करतें हैं। त्यौहार समय -समय पर आकर हमारे जीवन में नई चेतना,स्फूर्ति,उमंग तथा साहस जगातें हैं जिससे हमारे जीवन को नई दिशा मिलती है। त्योहारों के अवसरों पर  ही हमें अपने घर -परिवार तथा आस -पड़ोस के लोगो को जानने- पहचानने का समय मिलता है। भारत  देश को वैसे भी विभिन्न त्योहारों को मनाने वाला  देश कहा जाता है क्योकि यहां पर बहुत से त्यौहार मनाएं जातें हैं। हर त्यौहार की अपने आप में विशेषताँए हैं पर फिर भी जन्माष्टमी पर्व की बात ही निराली है। अगर आप जन्माष्टमी पर निबन्ध  ( Essay on Janamashtmi in Hindi )  लिखना चाहते है तो इस ब्लॉग पोस्ट को पढ़े।

श्री कृष्ण जन्माष्टमी (Shri Krishna Janamashtmi) का पर्व कब मनाया जाता है। 

जन्माष्टमी पर्व भादप्रद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी की रात्रि को मनाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु ने धरती पर श्री कृष्ण के रूप में माता देवकी और पिता वासुदेव के पुत्र के रूप में अवतार लिया था। जन्माष्टमी पर्व को  श्री कृष्ण जन्माष्टमी,कृष्णाष्टमी ,गोकुलाष्टमी,अष्टमी रोहिणी, श्री कृष्ण जयंती आदि नामों से भी मनाया जाता है। हिन्दू ग्रंथों के  आधार पर कालचक्र को चार भागों या युगों में बांटा जाता है-सतयुग,द्वापर ,त्रेता तथा कलयुग। श्री कृष्ण जी को द्वापर युग में भगवान् विष्णु का अवतार माना जाता है। 

 जन्माष्टमी पर्व हिन्दुओं का प्रसिध त्यौहार है। कृष्ण जन्माष्टमी शब्द का अर्थ है कि कृष्ण का जन्म भादप्रद की अष्टमीं के दिन हुआ था। कुछ लोग अष्टमी को दूसरे नज़रिये से भी देखतें हैं , उनका मानना है की अष्टमीं  का अर्थ है आठवीं संतान क्योंकि श्री कृष्ण का जन्म देवकी माता की आठवीं संतान के रूप में हुआ था।    

भगवान विष्णु का धरती पर श्री कृष्ण अवतार का मुख्य कारण। 

 हिन्दु पुराणों की मान्यता के आधार पर माना जाता है कि धरती माता राजा कंस के अत्याचारों से काफी दुखी थी ,धरती पर पाप अपने शिखर पर था। इस दुःख के निवारण के लिए वह गऊ रूप लिए सृष्टि के रचयिता ब्रम्हा जी के पास गई और उन्होंने अपनी व्यथा सुनाई और इन पापों को नष्ट करने का आग्रह किया। उनकी बात सुन ब्रम्हा जी ने उन्हें आश्वासन देकर वापिस भेज दिया। धरती  माता के जाने के उपरांत ब्रम्हा जी सभी देव जनों को साथ लेकर भगवान विष्णु के पास गए और धरती माँ की समस्या का निवारण करने का आग्रह  किया। सभी देव जनों की बात को सम्मान देते हुए विष्णु जी ने कहा  की वह जल्द ही धरती पर वासुदेव और देवकी की आठवीं संतान के रूप में जन्म  लेंगें और जल्द ही कंस के अत्याचारों का विनाश करेंगें। और इसे पूरा करने के लिए उन्होंने भादप्रद की अष्टमी के दिन  बाल – कृष्ण का  रूप लिए धरती पर अवतार लिया। 

श्री कृष्ण जन्माष्टमी की कहानी (Shri Krishna Janamashtmi Story in Hindi)

ऐसा माना गया है कि मथुरा के राजा उग्रसेन के छोटे भाई देवक की बेटी देवकी थी।सारे राज्य के कार्य को कंस ही संभालता था। कंस राकक्षसी , घमंडी स्वभाव  का और बहुत ही दुराचारी था।  जब उनकी चचेरी बहन देवकी की शादी सूरसेन के बेटे वासुदेव से हुई , तब वह काफी उदास हो गए, उनका अपनी बहन से काफी स्नेह था। इसलिए वह अपनी  बहन को उसके ससुराल छोड़ने के लिए उनका सारथी बन चल पड़े। रास्ते में अचानक एक भविष्यवाणी हुई कि “जिस बहन को तुम इतने चाव/स्नेह  से उसके घर छोड़ने जा रहे हो उसी की आठवीं संतान, तुम्हारी मौत का कारण होगी”। यह सब सुनकर कंस घबरा गया और गुस्से में आकर अपनी बहन देवकी को जान से मारने लगा कि  तभी वासुदेव ने समझाया की आकाशवाणी के अनुसार देवकी की आठवीं संतान ही तुम्हारी मौत का कारण है न की देवकी। यह सुनकर कंस ने देवकी की जान तो बख्श दी परन्तुं उन्हें कारागार में डाल दिया। 

कारागार में ही कंस ने देवकी की सात संतानों को एक -एक करके जन्मों उपरान्त  मार डाला। जैसे ही कंस को देवकी की आठवीं संतान होने पता चला उसकी परेशानी(बेचैनी) धीरे -धीरे बढ़ने लगी। इसी चिंता के कारण कंस ने कारागार में राक्षसों का कड़ा पहरा लगा दिया जो उसे पल -पल की खबर देते थे। पर भादप्रद की अष्टमीं के दिन जब श्री कृष्ण का जन्म हुआ तब बहुत ही तेज तूफान और वर्षा हो रही थी , यमुना नदी में पानी का स्तर भी काफी ऊपर था। सारे राक्षस गहरी नींद में सो गए। तभी विष्णु जी ने वासुदेव को उनके स्वपन में आकर श्री कृष्ण जी को गोकुल में उनके मित्र के घर छोड़कर आने को कहा और उनके नवजात शिशु को कारगार में लाने का आदेश दिया। इतने तूफ़ान में यमुना पार कर वासुदेव कृष्ण को गोकुल और उनकी बेटी को कोठरी में ले आये। और प्रभु की लीला से यह सब बातें वासुदेव के मस्तिक्ष में नहीं रहीं ,ऐसा इसलिए भी था क्योंकि वासुदेव कभी भी झूठ नहीं बोलते थे और अगर ये बातें उन्हें स्मरण रहतीं तो वह कंस को बता देते। 

 सुबह जब राजा कंस को आठवीं संतान के बारे में पता चला तब वो गुस्से में कोठरी में आया और जैसे ही उसने आठवीं संतान को मारना चाहा वह अतितीव्र आवाज़ के साथ बिजली बन आसमान में चली गई और कहा की “तुम्हारा काल इस धरती पर गोकुल में जन्म  में  ले चुका है और अब तुम्हारी मौत निश्चित है “।  यह बात सुनकर  कंस आगबबूला हो गया और उसने बालक को ढूढ़ने के लिए और जान से मारने के लिए राक्षसी पूतना को भेजा। राक्षसी पूतना कृष्ण को अपना विषैला दूध पिलाकर मारना चाहती थी परन्तु बाल कृष्ण ने दातों से काटकर उसी के विष से पूतना को मार डाला। फिर कंस ने हाथी ,घोड़े ,बैल ,सर्प आदि रूपों वाले राक्षसों को बाल कृष्ण को मारने के लिये भेजा पर कृष्ण ने इन सब का वध /उद्धार  कर दिया। अंत में राजा कंस को भी मृत्यु की नींद सुलाकर अपने माता -पिता को भी कारागर से छुड़वाया। 

कृष्ण जन्माष्टमी की तैयारियाँ 

कोई भी पर्व हो उसकी तैयारियाँ  कुछ समय पहले से ही शुरू हो जाती  हैं। कृष्ण जन्माष्टमी के आगमन से पहले ही मंदिरों को रंग -बिरंगे फूलों और गुब्बारों से खासतौर से सजाया जाता है। सभी मंदिरों में अलग -अलग झाँकियाँ निकाली जाती है , झाँकियों में अलग -अलग द्रिष्य  को दर्शाया जाता है।गावों व शहरों में भी अनेक झूलों तथा झांकियों का प्रदर्शन होता है जिसे देखने हजारों लोग आतें हैं। कई स्थानों में झांकियां या नगर कीर्तन निकले जातें हैं। स्कूलों में भी रंगा -रंग कार्य -क्रम होतें हैं ताकि बच्चों  को भी  इसके बारे में जानकारी मिल सके। इस दिन अनेक कार्यक्रम आयोजित किए जातें हैं जैसे की ,रंगा -रंग कार्यक्रम ,दही -हांडी प्रतियोगिता ,नाच -गान ,भजन -कीर्तन आदि।

इस अवसर पर बच्चों को विशेष रूप से कृष्ण -राधा का रूप बनाकर नृत्य का भी आयोजन किया जाता है। तरह -तरह की झांकियां होती हैं – झाँकियों में किसी द्रिश्य  में कंस के राज को दिखाया जाता है , किसी में देवकी और वासुदेव को कारागार में और कई झाँकियों में नंदलाल ,माखनचोर कन्हिया को विभिन्न रूपों में दिखाया जाता है। सबसे बड़ी पालकी में श्री कृष्ण की बाल -रुपी मूर्ति को रखकर या किसी नन्हें बालक को उनकी वेशभूषा पहनाकर झूला- झुलाया जाता है। सभी लोग इस झूलने को झुलाकर भगवान् श्री कृष्ण का आशीर्वाद लेते हैं। लोग श्री कृष्ण के भजन कीर्तन में लींन हो जातें हैं। बाज़ारों में विशेष तौर पर कृष्ण-राधा  की  वेश- भूषा के वस्त्रों को देखा जाता है। इस दिन  लोग अपने -अपने बच्चों को कृष्ण-राधा के रूप में देखना चाहतें हैं इस लिए कृष्ण -राधा की वेश-भूषा पहनाते हैं। 

व्रत या उपवास 

लोग आस्था और विश्वास  के साथ उनके जन्म -दिन के पावन अवसर पर व्रत अवश्य ही रखतें हैं। जन्माष्टमी के दिन सुबह जल्दी उठकर नहाने के उपरान्त पूजा कर अपने व्रत का आरम्भ करतें हैं और अगले दिन की शुरुआत होने के बाद ही उपवास की समाप्ति होती है। आधी रात १२ बजे अष्टमी के दिन श्री कृष्ण की पूजा अर्चना की जाती है। उपवास /व्रत सभी लोग अपनी -अपनी मान्यता या हिम्मत के हिसाब से करते हैं। कुछ लोग इस दिन कुछ भी ग्रहण नहीं करतें हैं पर कुछ लोग इस दिन फलों का सेवन करतें हैं। व्रत करना शास्त्रों में नहीं लिखा है, किन्तु लोग इसे अपनी श्रद्धा भावना से करतें है। 

दही -हांडी प्रतियोगिता 

जन्माष्टमी पर्व को हर्षो -उल्लाहस के साथ मनाया जाता है। युवकों में इस पर्व का काफी  उत्साह देखने को मिलता है। जन्माष्टमी के पावन उपलक्ष्य पर दही -हांडी प्रतियोगिताएं रखी जाती हैं।  यह  प्रतियोगिताएं सम्पूर्ण भारत परन्तु मुख्यतः महाराट्र ,मथुरा तथा वृंदावन में आयोजित की जाती हैं। यह  प्रतियोगिताएं कृष्ण के बाल रूप की नटखट शैतानियों को ब्यान करतीं है। बचपन में बाल कृष्ण सारा दूध ,दही और माखन खा लिया करते थे। अपने घर का ही नहीं अपितु पुरे वृन्दावन का माखन चुराकर खा लेते थे। इससे  तंग आकर माता यशोदा और गांव की सभी औरतें दही और माखन को ऊंचाई पर लटका देतीं थी ताकि बच्चे इस तक न पहुँच पाएं। पर कान्हा (कृष्ण जी )अपने सभी मित्रों के साथ , झुण्ड बनाकर ,उनका  सहारा लेकर हांडी,  तक पहुंच जाया करते थे और दही व माखन चुराकर खा लेते थे इसलिये कान्हा को माखनचोर नाम से भी पुकारा करते थे।  अब इस अवसर को प्रतियोगितायों के रूप  मनाया जाता है। 

प्रतियोगिता में एक हांडी में दही और माखन डालकर ऊंचाई पर रस्सियों से बांधा  जाता है और युवक(लड़के) अपनी -अपनी टोलियां (दल ) बनाकर इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेते हैं।  प्रतियोगिता में हर दल हांडी फोड़ने की कोशिश करता है और जो दल विजयी होता है उसे उचित इनाम भी दिया जाता है। इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए युवकों  में बहुत साहस देखने को मिलता है और इस की तैयारियां भी वह काफी समय पहले से ही शुरू कर देतें हैं। यह  प्रतियोगिताएं देखने वालों को भी उतना ही मज़ा आता है जितना कि  भाग(हिस्सा ) लेने वालों को। दही -हांडी प्रतियोगिता जन्माष्टमी पर्व को दूसरे पर्वों से खास बनाती हैं। 

श्री कृष्ण की बाल लीलाएं -रास लीलाएं। 

श्री कृष्ण का सम्पूर्ण जीवन ही हमारे लिए एक प्रेरणा स्रोत्र है। उनके जीवन के हर घटना -क्रम से हमें कुछ -कुछ शिक्षा मिलती है , चाहे बाल रूप में की गई बाल -लीलाएं हों या रास -लीलाएं ,हरेक लीला हमें विशेष संदेश देती है। श्री भगवतः  गीता से हर इंसान को सम्पूर्ण  ज्ञान की प्राप्ति होती है। श्री कृष्ण ने अपने जीवन में अनेक लीलाएं की जैसे कि –राक्षसी पूतना का वध, करवट उत्सव (करवट लेने वाली लीला को अब पर्व के रूप में मनाया जाता है ) और  शकटासुर वध ,कृष्ण और बलराम की नामकरण संस्कार लीला ,कृष्ण की माखन चोरी लीला ,गोपियों की माँ से शिकायत लीला ,कृष्ण का मिट्टी खाना और विराट रूप दर्शन ,कृष्ण ऊखल बंधन लीला ,कृष्ण फल की फल बेचने वाली लीला तथा वसासुर ,वत्सासुर ,वकासुर और अधसूर  वध लीला ,गुरु ब्रह्मा मोह भंग लीला ,कृष्ण का गऊ -चरण और धेनकासुर वध ,काली नाग दमन (वध ) लीला ,कृष्ण दावानल और प्रावलासुर का वध ,गोपी वेणु गीत (गोपियों के साथ गीत गाना ),गोपी वस्त्र चीर -हरण या वस्त्र हरण लीला ,श्री कृष्ण की यज्ञपत्नियों पर कृपा लीला ,गोवर्धन पर्वत को उठाने की लीला,कृष्ण द्वारा सुदर्शन विद्याधर का उद्धार लीला,शंखचूड़ यक्ष का वध ,अरिष्टासुर का वध लीला, केशी और व्योमासुर का उद्धार लीला,कंस द्वारा अक्रूर जी को भेजकर श्री कृष्ण और बलराम को मथुरा लाने वाली लीला , मथुरा की गमन लीला ,मथुरा -वासियों पर श्री कृष्ण की कृपा ,कुब्जा पर कृपा लीला ,धनुष का भंजन लीला ,कुवलयापीड़ हाथी का वध ( उद्धार लीला) ,कृष्णा और बलराम द्वारा चाणुर और मुष्टिक वध , श्री कृष्ण द्वारा अपने मामा कंस का वध, माता देवकी और पिता वासुदेव को कारागार से निकालना लीला।

कृष्ण और बलराम का विद्या अध्यन और ६४ दिन चौंसठ कला ,श्री कृष्ण द्वारा उद्धव को ब्रज भेजा जाना ,कुंजा और अक्रूर के घर जाना लीला ,श्री कृष्ण और जरासंध के बीच का युद्ध, फिर रणछोड़ कहलाना और कालयवन का उद्धार करना ,कृष्ण और राजा मूलचंद की कथा ,श्री कृष्ण का रुक्मणी से विवाह लीला , कृष्ण के पुत्र प्रधुमन का जन्म,  स्यमन्तक मणि कथा ,श्री कृष्ण बाकि विवाह की कथाएं ,गिरगिट (राजा नृग ) को कुएं से बाहर निकालने की कथा या लीला ,पोंड्रिक वासुदव का वध ,भाई बलराम द्वारा दुविध वानर का वध,श्री कृष्ण की दैनिक दिनचर्या ,अर्जुन व भीम से कराया ,अपनी बहन द्रोपदी का विवाह अर्जुन से कराना , फिर सम्पूर्ण महाभारत कथा में श्री कृष्ण का योगदान देना , महाभारत युद्ध के बाद गांधारी से श्राप और श्राप को पूरा करना भी शामिल है।दन्तवक्र और विदुरथ का उद्धार , बलराम जी का तीर्थयात्रा पर जाना ,मित्र सुदामा से मिलाप लीला , पुरे वंश का नाश होते देखना ,भगवान् श्री कृष्ण का अपने लोक वापिस जाना (मृत्यु होना ) 

श्री कृष्ण की यह सब लीलाएं हमें कुछ न कुछ प्रेरणाएँ देतीं हैं। इन सब से हम श्री कृष्ण के व्यक्तित्व को पहचान पातें हैं कि वह योगी,गृहस्थ ,कूटनीतिज्ञ ,कलाकार ,तपस्वी ,महान पुरषार्थी ,दार्शनिक ,प्रशासक ,मनस्वी थे। उनके विभिन्न चरित्रों का वर्णन इन सभी लीलाओं से होता है। 

उपसंहार – जन्माष्टमी पर निबन्ध  ( Essay on Janamashtmi in Hindi )

भगवान श्री कृष्ण का सम्पूर्ण जीवन ही प्रेरणा -स्रोत्र है और हमारे लिए आदर्श है। श्री भागवत गीता में अर्जुन को दिया सच्चा पाठ है। योगी और कर्मवीर होने के साथ -साथ उन्होंने सदैव सत्य पर चलने और सत्यपुरषों की बात सुनने का मार्ग दिखलाया। समय-समय पर लोगों की मदद की। जनाष्टमी त्यौहार को हमें स्नेह ,उत्साह और नए संकल्प के साथ मनाना चाहिए कि हम श्री कृष्ण के दिखलाये हुए मार्ग पर चल सकें और प्रभु हमें इस मार्ग पर चलने की शक्ति प्रदान करें। जिस प्रकार श्री कृष्ण ने अत्याचारियों /दुर्याचारियों को खत्म किया उसी प्रकार उनकी प्रेरणा से हमें भी हमारे देश/धरती  में फैली सभी बुराइयों को ख़त्म  करने का प्रयास करना चाहिए। हमें बुराइयों को नहीं अपितु भगवान्  श्री कृष्ण जी के संदेशों /उपदेशों को अपनाना चाहिए।

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सारांश (Summary ) जन्माष्टमी पर निबन्ध  ( Essay on Janamashtmi  in Hindi )

हम यह आशा करते है की इस पोस्ट जन्माष्टमी पर निबन्ध  ( Essay on Janamashtmi  in Hindi ) में आपको जन्माष्टमी के बारे में अच्छी जानकारी मिली होगी । चलो हम अब इसका सार जानने का प्रयास करते है।

  • जन्माष्टमी पर्व हिन्दुओं का प्रसिध त्यौहार है।
  • जन्माष्टमी पर्व भादप्रद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी की रात्रि को मनाया जाता है।
  • कृष्ण जन्माष्टमी शब्द का अर्थ है कि कृष्ण का जन्म भादप्रद की अष्टमीं के दिन हुआ था।
  • इस दिन दही -हांडी प्रतियोगिता  करवाई जाती है

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